रामू नाम था उसका
मजदुरी करता था वह
या शायद बेगारी
बिहार-नेपाल के शायद हर गाँव मेँ काम कर चुका था वह
ऐसा उसकी बातों से लगता था
हमारे घर भी काम किया था उसने
पर वह टिक न सका
आखिर क्यों?
पैसे तो चाहिए थे नहीँ उसको
भोजन?
नहीँ खाने की तो उसे पूरी आजादी थी
फिर क्या चाहिए था उसे?
शायद प्यार भरे दो बोल जिसकी खोज मेँ वह आज भी भटक रहा है|
लोगों से जब कह न सका तो मजबूरन कलम उठाना पड़ा,दर्द जब दिल ये सह न सका तो हमदर्द कागजों को बनाना पड़ा।
बुधवार, 29 अप्रैल 2015
रामू
गुरुवार, 9 अप्रैल 2015
वीआईपी संस्कृति
समान है सब फिर यह अतिविशिष्टता क्यों
लोकतंत्र में हो रही यह धृष्टता क्यों
अभिशाप है ऐसा यह जिसे खुद को हमने दिया है
प्राणघातक जाम में चुपचाप अबतक हमने जिया है
अपने सेवक का जो हमने आजतक सेवा किया है
वज्र बनकर हम गिरेंगे इस विकास-बाधक शूल पर
अब जो हुए है खड़े हम अभिशाप यह हरकर रहेंगे
समान है सब समानता का हक अपना लेकर रहेंगे।
#QuitVIPCulture
बुधवार, 28 जनवरी 2015
इस अंधी दौड़ में मै भी हो गया हूँ शामिल
ऐसा नही है कि यह दबाव मे लिया
गया फैसला था
उस वक्त मुझे यह एकदम उपयुक्त जान पड़ा था
शायद और अधिक सुखी होने की चाहत थी मुझमे
और मै कुद पड़ा था इस गलाघोंट प्रतिद्विँता कि दुनिया मे
फिर मुझे लगा किसी ने मेरी खुशीयाँ छीन ली है मुझसे
मै लौटना चाहता था पर लौट न सका
फिर यह सोचकर कि शायद यही नियती है मेरी जिंदगी की
मै उस दुनिया मे कही खो सा गया
जैसे मेरे सपनो का कोई अस्तित्व ही न हो|
गया फैसला था
उस वक्त मुझे यह एकदम उपयुक्त जान पड़ा था
शायद और अधिक सुखी होने की चाहत थी मुझमे
और मै कुद पड़ा था इस गलाघोंट प्रतिद्विँता कि दुनिया मे
फिर मुझे लगा किसी ने मेरी खुशीयाँ छीन ली है मुझसे
मै लौटना चाहता था पर लौट न सका
फिर यह सोचकर कि शायद यही नियती है मेरी जिंदगी की
मै उस दुनिया मे कही खो सा गया
जैसे मेरे सपनो का कोई अस्तित्व ही न हो|
रविवार, 14 दिसंबर 2014
बड़बोलेपन का दौर
है नहीं यह अभिव्यक्ति और न संवाद है
राजनिति से आम जीवन तक यह क्यों व्याप्त है
क्या वजह है कि हम बड़बोले होते जा रहे
वैश्विक तरक्की के दौर मे सृजनात्मकता खोते जा रहे
यह झुँझलाहट है शायद वैचारिकता के ह्रास की
या यह द्योतक है हमारे मौलिकता के नाश की
हम युवा क्यों हो गये गुमराह से
आयेंगे कैसे आखिर हम अब सही राह पे
सदस्यता लें
संदेश (Atom)