बुधवार, 28 जनवरी 2015

इस अंधी दौड़ में मै भी हो गया हूँ शामिल

ऐसा नही है कि यह दबाव मे लिया
गया फैसला था
उस वक्त मुझे यह एकदम उपयुक्त जान पड़ा था
शायद और अधिक सुखी होने की चाहत थी मुझमे
और मै कुद पड़ा था इस गलाघोंट प्रतिद्विँता कि दुनिया मे
फिर मुझे लगा किसी ने मेरी खुशीयाँ छीन ली है मुझसे
 मै लौटना चाहता था पर लौट न सका
फिर यह सोचकर कि शायद यही नियती है मेरी जिंदगी की
 मै उस दुनिया मे कही खो सा गया
 जैसे मेरे सपनो का कोई अस्तित्व ही न हो|

रविवार, 14 दिसंबर 2014

बड़बोलेपन का दौर

है नहीं यह अभिव्यक्ति और न संवाद है 
राजनिति से आम जीवन तक यह क्यों व्याप्त है 
क्या वजह है कि हम बड़बोले होते जा रहे 
वैश्विक तरक्की के दौर मे सृजनात्मकता खोते जा रहे 
यह झुँझलाहट है शायद वैचारिकता के ह्रास की 
या यह द्योतक है हमारे मौलिकता के नाश की 
हम युवा क्यों हो गये गुमराह से 
आयेंगे कैसे आखिर हम अब सही राह पे